वैसे तो कई कथा है गणपति के जन्म को लेकर पर सबसे प्रचलित कथा के अनुसार एक बार महादेव भोगावती नदी पर स्नान करने गए । उनके चले जाने के बाद माता पार्वती ने स्नान से पूर्व शरीर पर हल्दी का उबटन लगाया । उन्होंने अपने तन के शुद्ध मेल से छोटे से बालक का एक पुतला बनाया और उसमें प्राण डाले। माता पारवती ने बालक का नाम ‘गणेश’ रखा। और इस तरह भगवान गणेश की उत्पत्ति हुई। उसके आगे की कथा के अनुसार माता पार्वती ने बालक से कहा कि ” तुम द्वार पर बैठ जाओ और जब तक मैं नहा रही हूं किसी को अंदर मत आने देना।नदी में स्नान करने के बाद जब भगवान शिव अपने महल पहुंचे तो गणेश जी ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया। शिवजी के बहुत समझाने पर भी गणेश जी नहीं माने और उन्हें अंदर नहीं जाने दिया। परिणाम स्वरुप बालक गणेश और शिवगणों के बीच भयानक युद्ध हुआ लेकिन, थे तो गणेश माता पार्वती के ही पुत्र उनको हराना नामुमकिन था इसलिए उन्हें कोई भी हरा नहीं सक। अतःभगवान शिव ने क्रोध में आकर अपने त्रिशूल का उपयोग करा और नन्हे बालक का सिर काट कर भीतर चले गए। जब माता पार्वती को इस बात का पता चला तो वे बहुत क्रोधित हुईं और उन्होंने ब्रह्मांड को नष्ट करने का निश्चय कर डाला। उन्हें शांत करने के लिए, भगवान शिव ने गरुड़ जी से कहा कि उत्तर दिशा में जाओ और जो भी मां अपने बच्चे की तरफ पीठ कर के सो रही हो उस बच्चे का सिर ले आओ। गरुड़ जी की काफी देर बाद तक ऐसा कोई नहीं मिला। अंततः एक हथिनी अपने बच्चे के साथ नजर आई। गरुड़ जी उस शिशु हाथी का सिर काट कर ले आए।महादेव ने हाथी के सिर को लड़के के धड़ पर प्रत्यारोपित किया और गणेश को पुनर्जीवित कर दिया। पार्वती उसे पुनः जीवित देख बहुत खुश हुई तब समस्त देवताओं ने बालक गणेश को आशीर्वाद दिए।साथ ही साथ महादेव ने बालक का नाम गणों का प्रमुख ‘ गणपति’ रखा और आशीर्वाद देते हुए समस्त गणों का अध्यक्ष घोषित कर दिय।
देवताओं ने गणेश जी को तमाम शक्तियां प्रदान की और प्रथम पूज्य बनाया। भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि किसी भी मांगलिक कार्य की शुरुआत अगर गणेश पूजा से होगी तो वो सफल होग। आप जानते है यह घटना भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को हुई थी इसलिए इस तिथि को ‘गणेश चतुर्थी’ के रूप में मनाया जाता है।
